Teorier om interesse (med kritikk) | Hindi | Lån | Økonomi

Les denne artikkelen på hindi for å lære om de fire viktigste teoriene om interesse (med kritikk).

1. सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त (marginell produktivitetsteori):

यह सिद्धान्त ब्याज दर निर्धारण का सबसेराना सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन माल्थस, जे. बी. से (JB Say) आदि विद्वानों ने किया। पूँजी में उत्पादन क्षमता होती है क्योंकि पूँजी कीायता से्रम और भूमि की्पादकता कोाबढ़ा जा सकता है। फलस्वरूप पूँजी उत्पादन का एक प्रमुख अंग है क्योंकि पूँजी के्रयोग से उत्पादकता में वृद्धि होती है।

इसी बढ़ी हुई उत्पादकता का जोाभ पूँजी के स्वामी कोा जाता है्याज कहलाता त। उत्पत्ति के अन्य साधनों की तरह पूँजी में भी उत्पत्ति ह्रास नियमाल होता है। पूँजी के क्रमिक उपयोग किये जाने पर पूँजी की नान्त उत्पादकता घटती है।

दीर्घकाल में्याज दर की वृत्रवृत्ति पूँजी सीमान्त उत्पादकता केराबर होने की होती है। जब ब्याज की दर पूँजी की सीमान्त उत्पादकता से अधिक तब तब पूँजी की माँग कम हो जायेगी जिससे पूँजी सीम न द द ज वह वह वह औ

इसके विपरीत, यदि पूँजी कीान्त उत्पादकता से य्याज दर कम है तब पूँजी की माँग बढ़ेगी जिससे पूँजी की सीमान्त उत्पादकता गिरेगी और वह गिरकर सीमान्त उततके

संक्षेप में, ब्याज के नान्त उत्पादकता सिद्धान्त केार दीर्घकाल में य्याज दर की्रवृत्ति पूँजी कीान्त उत्पादकता के बराबर होने की

एँाएँ ( kritikk):

ब्याज निर्धारण के इस सिद्धान्त में निम्न दोष हैं:

1. इस ध्धान्त में तिर्ति पक्ष को्कुल छोड़ा गया हैा है जबकि्याज og निर्धारण में पूर्ति पक्ष भीान रूप से महत्वपूर्ण होता है।

2. पूँजी की उत्पादकता कीा करना सम्भव नहीं है्योंकि अन्य साधनों केा पूँजी उत्पादन नहीं कर सकती।

3. विभिन्न व्यवसायों में पूँजी की उत्पादकता भी अलग-अलग होती है नरन्तु शुद्ध ब्याज दर सदैव एक ही होती है। कुल ब्याज दर में अन्तर पाया जाता हैरन्तु शुद्ध ब्याज दर में अन्तर नहीं पाया जाता। इस विरोधाभास को यह सिद्धान्त स्पष्ट नहीं करता।

4. यह ध्धान्त इस बात पर प्रकाश नहीं लतालता कि उत उत्पादकीय उद्देश्यों के लिए न लेकर लेक लेक्दकीयादकीय रार्यों के लिएाते हैं तो ब्याज द् पनक

2. त्याग का सिद्धान्त (avholdsteori ):

ब्याज दर निर्धारण के इस्सिदाध्त का प्रतिपादन प्रो. (र (Senior) नेा था। उनके अनुसार ब्याज बचता पुरस्कार हैर बचत नेरने में य्याग सहना पड़ता है योंकि्योंकि उपभोग स्थगन करना पड़ता है। उपभोग स्थगन की क्रिया में त्याग निहित है। इस त्याग के बदले जो परितोषिक अथवा प्रतिफल दिया जाता है वही ब्याज दर है।

त्याग में दुःख और असुविधा का सामना करना पड़ता है। वास्तव में, प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री पूर्ण रोजगार कोारभूत स्थिति मानकर चले हैं। उनका विश्वास था किर्थव्यवस्था में जो कुछ जितर्जित किया जाता है वह स्वतः ही उपभोग पर प्प कर दिया जाता है। अर्थव्यवस्था में इस्रकार आय और व्यय का चक्रीय प्रवाह बना रहता हैर पूर्ति अपनीाँग को वतः्वतः उत्पन्न कर देती है।

प प्रकार यदि कभी बचत होती है वह उपभोग कमरने अथवा स्थगित करने के फलस्वरूप होती है। उपभोग कम करने अथवा स्थगित करने में त्याग सहना पड़ता है। इस परित्याग के बदले जोरस्कार दिया जाता है वही ब्याज दर है। लोगों को बचत करने के लिए ोत्रोत्साहित करने की दृष्टि से सरस्कार आवश्यक है।

Critा ( kritikk):

इस सिद्धान्त में भी प्रमुख रूप से निम्न दोष हैं:

(i) वास्तव में बचत करना मात्रा ब्याज का कारण नहीं बन सकता जब तक कि इसे उधार न दिया जाये।

(ii) धनी व्यक्तियों को बचत करने में कोई कष्ट नहीं होता; अतः उनके द्वारा दी गयीार राशि पर कोई य्याज नहींा चाहिए। यह बात वास्तव में व्यावहारिक नहीं है।

(iii) इस सिद्धान्त में माँग पक्ष को बिल्कुल छोड़ दिया गया है। अतः यह भी एक ारा सिद्धान्त है।

3. प्रतीक्षा सिद्धान्त ( Waiting Theory):

प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने थशर्थशास्त्र में णर्ण रोजगार कीान्यता को माना है। अनुस अनुसार, पूर्ोजग ररार एक शर्श स्थिति है जिसमें देश सभी सभी्राकृतिक सानवीय अपनीाधन अपनीर्ण क्षमता पर कार्य करते हैं। प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री एक ऐसी द्द अर्थव्यवस्था (Closed Economy) मानकर चले हैं जिसमें आय तथ व तथयय

अर्थव्यवस्था में कभी अत्युत्पादन (Overproduksjon) og सामान्य बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न नहीं होती। ऐसी अर्थव्यवस्था में यदि बचत सम्भव है तो वह उपभोग करने के फलस्वरूप ही होगी। क्रम करने का अर्थ है - कष्ट सहना। बचत करने के लिए आय की ष्षा व्यय कम करना पड़ता है।

मार्शल ने उपभोग स्थगन शब्द जिसका प्रयोग सीनियर नेा था, के स्थान पर प्रतीक्षा (venter) शब्द का प्रयोग किया है। मार्शल के अनुसार, ब्याज og प्रतीक्षा का पुरस्कार है।

साधारण व्यक्ति वर्तमान आवश्यकताओं का त्याग तभीरेगा जब उसे भविष्य में कुछ अधिक तुष्टिगुण प्राप्त होने की सम्भावना हो। जब वर्तमान में बचत की गयी राशि कुछ समय के उधार दीाती है तो बचतकर्ता को्रतीक्षा करनी पड़ती है। ऐसी्रतीक्तीका के बदले जोरस्कार मिलता है वही ब्याज दर है।

जहाँ तक इस सिद्धान्त के दोषों का प्रश्न है, इस सिद्धान्त में भी वही दोष हैं जो स थगन सिद थगन थगन थगन

4. समय अधिमान सिद्धान्त ( Time Preference Theory):

इस सिद्धान्त के प्रतिपादन का श्रेय पो. जॉन रे (John Ray), वॉहमावर्क (Bohm Bawerk) तथा इरविन फ्शिर कोाता है। यह एक स्वाभाविक बात है कि हम भविष्य की्यकताओं की ष्षा तमर्तमान आवश्यकताओं को अधिक महत्व देते हैं। जब व्यक्ति ऋण देता है वह वर्तमान आवश्यकताओं का त्याग करता है और भविष्य की्यकताओं कोरा करने की मनःस्थिति बनाता है।

दूसरे शब्दों में, उधार देनेाला व्यक्ति वर्तमान की अपेक्षा भविष्य को अधिक महत्व देता है। ऐसे यक्यक्ति को रुपया, उधार लेनेाला व्यक्ति इतना रुपया जरूर वापस करे जिससेार देनेाले का वर्तमान और भविष्य के जो अन अन्तर है वह पू समय के बीचाअधिम न्तर ही ब्याज को उत्पन्न करता है।

कुछ लोग वर्तमान सन्तुष्टि को भविष्य की सन्तुष्टि की अपेक्षा अधिक महत्व देते हैं। जब लोग्रा उधार देते हैं तो्हें वर्तमान सन्तुष्टि का त्याग करना पड़ता है। त्याग वे तभी करेंगे जबकि इसकी कीमत थर्थात् ब्याज उन्हें पुरस्कार स्वरूप मिले।

Critा ( kritikk):

यह सिद्धान्त इस बात को पष्पष्ट नहीं करता कि ऋणी ब्याज क्यों दे। यह सिद्धान्त भी एकपक्षीय है क्योंकि इसमें भीाँग की उपेक्षा की जाती है।

 

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